ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे|
एक दिल देके ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे|
है हुसूल-ए-आरज़ू[1] का राज़[2] तर्क-ए-आरज़ू[3],
मैंने दुनिया छोड़ दी तो मिल गई दुनिया मुझे|
कह के सोया हूँ ये अपने इज़्तराब-ए-शौक़ से,
जब वो आयेँ क़ब्र पर फ़ौरन जगा देना मुझे|
सुबह तक क्या क्या तेरी उम्मीद ने ताने दिये,
आ गया था शाम-ए-ग़म एक नींद का झोंका मुझे|
ये नमाज़-ए-इश्क़ है कैसा अदब किसका अदब,
अपने पाय-ए-नमाज़ पर करने दो सज़दा मुझे|
देखते ही देखते दुनिया से मैं उठ जाऊँगा,
देखती की देखती रह जाएगी दुनिया मुझे|
शब्दार्थ:
↑ इच्छा-पूर्ति
↑ रहस्य
↑ इच्छा का त्याग
Thursday, 15 March 2012
सीमाब अकबराबादी
शब-ए-ग़म ऐ मेरे अल्लाह बसर भी होगी|
रात ही रात रहेगी के सहर भी होगी|
[सहर=शाम]
मैं ये सुनता हूँ के वो दुनिया की ख़बर रखते हैं,
जो ये सच है तो उंहें मेरी ख़बर भी होगी|
चैन मिलने से है उन के न जुदा रहने से,
आख़िर ऐ इश्क़ किसी तरह बसर भी होगी|
रात ही रात रहेगी के सहर भी होगी|
[सहर=शाम]
मैं ये सुनता हूँ के वो दुनिया की ख़बर रखते हैं,
जो ये सच है तो उंहें मेरी ख़बर भी होगी|
चैन मिलने से है उन के न जुदा रहने से,
आख़िर ऐ इश्क़ किसी तरह बसर भी होगी|
सीमाब अकबराबादी
नसीम-ए-सुबह गुलशन में गुलों से खेलती होगी|
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी|
[नसीम=हवा]
तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ,
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी|
[दानिस्ता=जान बूझ कर/क्नोविन्ग्ल्य]
मज़ा आ जायेगा महशर में कुछ सुनने सुनाने का,
ज़ुबाँ होगी हमारी और कहानी आप की होगी|
[महशर=फैसले का दिन]
सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर दिख दूँगा,
हमारे साथ तुम होगे ये दुनिया देखती होगी|
यही आलम रहा पर्दानशीनों का तो ज़ाहिर है,
ख़ुदाई आप से होगी न हम से बंदगी होगी|
[ज़ाहिर=प्रकट]
त'अज्जुब क्या लगी जो आग ऐ 'सीमाब' सीने में,
हज़ारों दिल मे अँगारे भरे थे लग गई होगी|
किसी की आख़िरी हिचकी किसी की दिल्लगी होगी|
[नसीम=हवा]
तुम्हें दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ,
नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी|
[दानिस्ता=जान बूझ कर/क्नोविन्ग्ल्य]
मज़ा आ जायेगा महशर में कुछ सुनने सुनाने का,
ज़ुबाँ होगी हमारी और कहानी आप की होगी|
[महशर=फैसले का दिन]
सर-ए-महफ़िल बता दूँगा सर-ए-महशर दिख दूँगा,
हमारे साथ तुम होगे ये दुनिया देखती होगी|
यही आलम रहा पर्दानशीनों का तो ज़ाहिर है,
ख़ुदाई आप से होगी न हम से बंदगी होगी|
[ज़ाहिर=प्रकट]
त'अज्जुब क्या लगी जो आग ऐ 'सीमाब' सीने में,
हज़ारों दिल मे अँगारे भरे थे लग गई होगी|
Saturday, 11 February 2012
अकबर इलाहाबादी
हंगामा है क्यूँ बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है
ना-तजुर्बाकारी से वाइज़[1] की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है
उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
मक़सूद[2] है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है
वां[3] दिल में कि दो सदमेयां[4] जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है
हर ज़र्रा चमकता है अनवर-ए-इलाही[5] से
हर साँस ये कहती है कि हम हैं तो ख़ुदा भी है
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत[6] के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है
शब्दार्थ:
↑ धर्मोपदेशक
↑ मनोरथ
↑ वहाँ
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है
ना-तजुर्बाकारी से वाइज़[1] की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है
उस मय से नहीं मतलब दिल जिस से है बेगाना
मक़सूद[2] है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है
वां[3] दिल में कि दो सदमेयां[4] जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है
हर ज़र्रा चमकता है अनवर-ए-इलाही[5] से
हर साँस ये कहती है कि हम हैं तो ख़ुदा भी है
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत[6] के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर अल्लाह की मर्ज़ी है
शब्दार्थ:
↑ धर्मोपदेशक
↑ मनोरथ
↑ वहाँ
अकबर इलाहाबादी
कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मजमा है वहाँ हूरों की महफ़िल है ।
इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।
ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा
मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है मेरा दिल है ।
जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर
अरे तू कौन है हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।
हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।
यहाँ परियों का मजमा है वहाँ हूरों की महफ़िल है ।
इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।
ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा
मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है मेरा दिल है ।
जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर
अरे तू कौन है हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।
हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।
अकबर इलाहाबादी
कहाँ ले जाऊँ दिल दोनों जहाँ में इसकी मुश्क़िल है ।
यहाँ परियों का मजमा है वहाँ हूरों की महफ़िल है ।
इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।
ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा
मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है मेरा दिल है ।
जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर
अरे तू कौन है हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।
हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।
यहाँ परियों का मजमा है वहाँ हूरों की महफ़िल है ।
इलाही कैसी-कैसी सूरतें तूने बनाई हैं
हर सूरत कलेजे से लगा लेने के क़ाबिल है।
ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा
मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है मेरा दिल है ।
जो देखा अक्स आईने में अपना बोले झुँझलाकर
अरे तू कौन है हट सामने से क्यों मुक़ाबिल है ।
हज़ारों दिल मसल कर पाँवों से झुँझला के फ़रमाया
लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है ।
अकबर इलाहाबादी
कट गई झगड़े में सारी रात वस्ल-ए-यार की
शाम को बोसा लिया था सुबह तक तक़रार की
ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की
हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार[1] की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की
ज़हर देता है तो दे ज़ालिम मगर तसकीन[2] को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की
बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों[3] ने गली में यार की
लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की
थूक दो ग़ुस्सा फिर ऐसा वक़्त आए या न आए
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की
हाल-ए-'अकबर' देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई ऐसे रिन्द ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की
शब्दार्थ:
↑ ग़ैर
↑ तसल्ली
↑ दोस्तों
शाम को बोसा लिया था सुबह तक तक़रार की
ज़िन्दगी मुमकिन नहीं अब आशिक़-ए-बीमार की
छिद गई हैं बरछियाँ दिल में निगाह-ए-यार की
हम जो कहते थे न जाना बज़्म में अग़यार[1] की
देख लो नीची निगाहें हो गईं सरकार की
ज़हर देता है तो दे ज़ालिम मगर तसकीन[2] को
इसमें कुछ तो चाशनी हो शरब-ए-दीदार की
बाद मरने के मिली जन्नत ख़ुदा का शुक्र है
मुझको दफ़नाया रफ़ीक़ों[3] ने गली में यार की
लूटते हैं देखने वाले निगाहों से मज़े
आपका जोबन मिठाई बन गया बाज़ार की
थूक दो ग़ुस्सा फिर ऐसा वक़्त आए या न आए
आओ मिल बैठो के दो-दो बात कर लें प्यार की
हाल-ए-'अकबर' देख कर बोले बुरी है दोस्ती
ऐसे रुसवाई ऐसे रिन्द ऐसे ख़ुदाई ख़्वार की
शब्दार्थ:
↑ ग़ैर
↑ तसल्ली
↑ दोस्तों
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